क्या पृथ्वी ही वह स्थान है जिसे धर्मों ने नरक कहा है?
मानव सभ्यता के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा विचार हो जो "नरक" जितना व्यापक रहा हो। दुनिया के लगभग हर धर्म और संस्कृति में किसी न किसी रूप में नरक, दोज़ख़ या Hell का वर्णन मिलता है। हिंदू धर्म में यमलोक और विभिन्न नरकों का उल्लेख है, इस्लाम में जहन्नम का, ईसाई धर्म में Hell का और यहूदी परंपरा में Gehenna का। नाम अलग हैं, कथाएँ अलग हैं, लेकिन मूल विचार एक ही है—कर्मों या पापों के परिणामस्वरूप मिलने वाला दंड।
सदियों से मनुष्य यह मानता आया है कि मृत्यु के बाद एक ऐसी जगह है जहाँ अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब होगा। लेकिन क्या कभी हमने यह विचार किया है कि कहीं हम नरक को गलत दिशा में तो नहीं खोज रहे?
क्या यह संभव है कि जिस नरक की कल्पना धर्मग्रंथों में की गई है, वह कोई दूरस्थ लोक न होकर यही पृथ्वी हो?
पीड़ा का संसार
यदि हम अपने चारों ओर देखें, तो जीवन का हर रूप संघर्ष से भरा दिखाई देता है।
कोई भूख से तड़प रहा है, कोई बीमारी से, कोई युद्ध में मर रहा है, कोई अन्याय का शिकार है। जंगलों में एक जीव दूसरे जीव को जीवित निगल जाता है। समुद्र में बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। पक्षी, पशु, मनुष्य—सभी किसी न किसी प्रकार के भय, पीड़ा और मृत्यु के अधीन हैं।
यदि नरक का अर्थ पीड़ा है, तो यह संसार उस परिभाषा पर पूरी तरह खरा उतरता दिखाई देता है।
प्रकृति का नियम ही ऐसा है कि किसी का जीवन किसी दूसरे की मृत्यु पर निर्भर है। यहाँ जन्म है, संघर्ष है, रोग है, वृद्धावस्था है और अंततः मृत्यु है।
ग्रंथों में वर्णित यातनाएँ और वास्तविक संसार
हिंदू धर्मग्रंथों में अनेक प्रकार के नरकों का वर्णन मिलता है। कहीं पापियों को उबलते तेल में डाला जाता है, कहीं उन्हें अंगारों पर चलाया जाता है, कहीं उनके शरीर को नुकीले शस्त्रों और सुइयों से छलनी किया जाता है।
पहली दृष्टि में यह सब किसी अलौकिक संसार की कल्पना प्रतीत होता है।
लेकिन यदि हम वास्तविक संसार को देखें, तो एक विचित्र समानता दिखाई देती है।
मछलियों को गर्म तेल में तला जाता है।
मुर्गों, बकरों और अन्य जीवों को आग, कोयले और अंगारों पर भुना जाता है।
मछलियों के मुख में लोहे के काँटे घुसाकर उन्हें पानी से बाहर खींच लिया जाता है।
असंख्य जीवों के शरीर को काटा, छीला और टुकड़ों में विभाजित किया जाता है।
यदि नरक का अर्थ वही यातनाएँ हैं जिनका वर्णन ग्रंथों में मिलता है, तो वे यातनाएँ किसी अदृश्य लोक में नहीं, बल्कि हमारे सामने प्रतिदिन घटित होती दिखाई देती हैं।
जो दृश्य हम भोजन, व्यापार और जीवन के सामान्य भाग के रूप में देखते हैं, वही किसी अन्य दृष्टिकोण से नरक की यातनाओं का प्रत्यक्ष रूप भी हो सकते हैं।
मृत्यु के बाद दंड का प्रश्न
यहाँ एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है।
लगभग सभी धर्म कहते हैं कि मृत्यु के बाद आत्मा को उसके कर्मों के अनुसार दंड या पुरस्कार मिलता है।
लेकिन दंड मिलेगा कैसे?
पीड़ा का अनुभव करने के लिए शरीर आवश्यक है।
भूख शरीर को लगती है।
जलन शरीर महसूस करता है।
चोट शरीर को लगती है।
यातना शरीर सहता है।
यदि आत्मा अमर है, अविनाशी है और भौतिक तत्वों से परे है, तो उबलते तेल, आग, शस्त्र या किसी भी प्रकार का शारीरिक दंड वह कैसे अनुभव करेगी?
और यदि मृत्यु के बाद शरीर यहीं पृथ्वी पर छूट जाता है, तो दंड भोगने का माध्यम क्या होगा?
यह प्रश्न हमें पुनर्जन्म और कर्मफल की अवधारणा की ओर ले जाता है।
संभव है कि कर्मों का फल भोगने के लिए आत्मा को पुनः किसी शरीर में जन्म लेना पड़ता हो।
संभव है कि दंड का अर्थ ही विभिन्न योनियों में जन्म लेकर पीड़ा और संघर्ष का अनुभव करना हो।
यदि ऐसा है, तो पृथ्वी पर जन्म लेना ही कर्मों के परिणामों को भोगने की प्रक्रिया हो सकता है।
क्या सभी जीव कर्मफल भोग रही आत्माएँ हैं?
यदि आत्मा को दंड या फल प्राप्त करने के लिए शरीर चाहिए, और यदि शरीर केवल पृथ्वी पर जन्म लेकर ही प्राप्त किया जा सकता है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि पृथ्वी पर मौजूद प्रत्येक जीव किसी न किसी कर्मफल को भोग रहा है।
मछली, पक्षी, पशु, कीट, मनुष्य—सभी।
कोई शिकारी है, कोई शिकार।
कोई खा रहा है, कोई खाया जा रहा है।
कोई भय में जी रहा है, कोई अभाव में।
यह पूरा संसार कर्मों के परिणामों का एक विशाल क्षेत्र प्रतीत होता है।
ऐसा क्षेत्र जहाँ आत्माएँ विभिन्न रूपों में जन्म लेकर अपने कर्मों का अनुभव करती हैं।
मनुष्य की विशेष स्थिति
लेकिन इस विचार में एक महत्वपूर्ण अपवाद है—मनुष्य।
अन्य जीव अपने स्वभाव और प्रवृत्ति के अनुसार जीवन जीते हैं।
वे यह नहीं पूछते कि जीवन क्या है।
वे यह नहीं सोचते कि दुःख क्यों है।
वे यह नहीं समझते कि मृत्यु के बाद क्या होगा।
लेकिन मनुष्य यह सब पूछ सकता है।
मनुष्य अपने अस्तित्व पर विचार कर सकता है।
वह स्वयं को देख सकता है।
वह प्रश्न कर सकता है।
वह सत्य की खोज कर सकता है।
यही कारण है कि भारतीय दर्शन में मानव जन्म को अत्यंत दुर्लभ और मूल्यवान कहा गया है।
नरक से बाहर निकलने का द्वार
यदि पृथ्वी वास्तव में कर्मफल भोगने का क्षेत्र है, तो मानव जीवन केवल दंड नहीं बल्कि अवसर भी है।
यही वह अवस्था है जहाँ आत्मा अपने बंधनों को पहचान सकती है।
यही वह अवस्था है जहाँ मनुष्य समझ सकता है कि दुःख का कारण क्या है।
यही वह अवस्था है जहाँ वह मोह, अहंकार, लोभ और अज्ञान से ऊपर उठ सकता है।
भारतीय दर्शन इसी मुक्ति को मोक्ष कहता है।
मोक्ष का अर्थ केवल मृत्यु के बाद किसी स्वर्ग में जाना नहीं, बल्कि जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाना है।
यदि संसार नरक है, तो मोक्ष उस नरक से बाहर निकलने का मार्ग है।
निष्कर्ष
शायद नरक कोई ऐसी जगह नहीं जहाँ हम मृत्यु के बाद जाएँगे।
शायद नरक वह अवस्था है जिसमें हम पहले से मौजूद हैं।
एक ऐसा संसार जहाँ जन्म है, संघर्ष है, पीड़ा है, भय है और मृत्यु है।
एक ऐसा संसार जहाँ ग्रंथों में वर्णित अनेक यातनाएँ प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देती हैं।
एक ऐसा संसार जहाँ आत्माएँ विभिन्न शरीरों में जन्म लेकर कर्मों के परिणामों का अनुभव करती हैं।
और शायद इसी कारण मनुष्य को चेतना दी गई है—ताकि वह इस व्यवस्था को समझ सके।
शायद सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि नरक कहाँ है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम उसे पहचान पाए हैं।
और उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम उससे मुक्त होने का मार्ग खोज रहे हैं। :::
यह संस्करण एक दार्शनिक निबंध/विचार-लेख की शैली में है।

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