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क्या हमें अब मंदिरों की आवश्यकता है?

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क्या हमें अब मंदिरों की आवश्यकता है? जब ईश्वर भीतर है, तो ईश्वर तक पहुँचने के लिए इतने बड़े मंदिर क्यों? हमने शायद ईश्वर को खोजने के लिए बहुत दूर जाना शुरू कर दिया है। कभी हमने कहा कि ईश्वर कण-कण में है। कभी कहा कि वह हर जीव में है। कभी कहा कि वह हमारे भीतर है। लेकिन धीरे-धीरे हमने उसी ईश्वर के लिए बड़े-बड़े भवन बना दिए और फिर मान लिया कि शायद ईश्वर इन भवनों में बाकी संसार की तुलना में थोड़ा अधिक मौजूद है। यहीं से एक सवाल जन्म लेता है— अगर ईश्वर वास्तव में सर्वव्यापी है, तो क्या उसे पाने के लिए मंदिर अनिवार्य है? क्या ईश्वर केवल मंदिर में है? क्या घर में नहीं? क्या सड़क पर नहीं? क्या जंगल में नहीं? क्या किसी गरीब के घर में नहीं? क्या उस बच्चे में नहीं जो दो दिन से भूखा है? और अगर ईश्वर हर जगह है, तो क्या हमारी धार्मिक व्यवस्था को भी इस सवाल का सामना नहीं करना चाहिए कि हम ईश्वर के नाम पर जमा किए गए धन का उपयोग आखिर किसके लिए कर रहे हैं? --- मंदिर कभी केवल पूजा का स्थान नहीं थे इतिहास को केवल आज की धार्मिक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। भारत के पुराने मंदिर कई बार केवल पूजा के केंद्र नह...

नरक, दोज़ख़ और Hell

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क्या पृथ्वी ही वह स्थान है जिसे धर्मों ने नरक कहा है? मानव सभ्यता के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा विचार हो जो "नरक" जितना व्यापक रहा हो। दुनिया के लगभग हर धर्म और संस्कृति में किसी न किसी रूप में नरक, दोज़ख़ या Hell का वर्णन मिलता है। हिंदू धर्म में यमलोक और विभिन्न नरकों का उल्लेख है, इस्लाम में जहन्नम का, ईसाई धर्म में Hell का और यहूदी परंपरा में Gehenna का। नाम अलग हैं, कथाएँ अलग हैं, लेकिन मूल विचार एक ही है—कर्मों या पापों के परिणामस्वरूप मिलने वाला दंड। सदियों से मनुष्य यह मानता आया है कि मृत्यु के बाद एक ऐसी जगह है जहाँ अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब होगा। लेकिन क्या कभी हमने यह विचार किया है कि कहीं हम नरक को गलत दिशा में तो नहीं खोज रहे? क्या यह संभव है कि जिस नरक की कल्पना धर्मग्रंथों में की गई है, वह कोई दूरस्थ लोक न होकर यही पृथ्वी हो? पीड़ा का संसार यदि हम अपने चारों ओर देखें, तो जीवन का हर रूप संघर्ष से भरा दिखाई देता है। कोई भूख से तड़प रहा है, कोई बीमारी से, कोई युद्ध में मर रहा है, कोई अन्याय का शिकार है। जंगलों में एक जीव दूसरे जीव को जीवित निगल जाता है। समुद्र...