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क्या हमें अब मंदिरों की आवश्यकता है?

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क्या हमें अब मंदिरों की आवश्यकता है? जब ईश्वर भीतर है, तो ईश्वर तक पहुँचने के लिए इतने बड़े मंदिर क्यों? हमने शायद ईश्वर को खोजने के लिए बहुत दूर जाना शुरू कर दिया है। कभी हमने कहा कि ईश्वर कण-कण में है। कभी कहा कि वह हर जीव में है। कभी कहा कि वह हमारे भीतर है। लेकिन धीरे-धीरे हमने उसी ईश्वर के लिए बड़े-बड़े भवन बना दिए और फिर मान लिया कि शायद ईश्वर इन भवनों में बाकी संसार की तुलना में थोड़ा अधिक मौजूद है। यहीं से एक सवाल जन्म लेता है— अगर ईश्वर वास्तव में सर्वव्यापी है, तो क्या उसे पाने के लिए मंदिर अनिवार्य है? क्या ईश्वर केवल मंदिर में है? क्या घर में नहीं? क्या सड़क पर नहीं? क्या जंगल में नहीं? क्या किसी गरीब के घर में नहीं? क्या उस बच्चे में नहीं जो दो दिन से भूखा है? और अगर ईश्वर हर जगह है, तो क्या हमारी धार्मिक व्यवस्था को भी इस सवाल का सामना नहीं करना चाहिए कि हम ईश्वर के नाम पर जमा किए गए धन का उपयोग आखिर किसके लिए कर रहे हैं? --- मंदिर कभी केवल पूजा का स्थान नहीं थे इतिहास को केवल आज की धार्मिक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। भारत के पुराने मंदिर कई बार केवल पूजा के केंद्र नह...