33 करोड़ देवताओं का रहस्य ? (Centre of Universe)

 33 करोड़ देवताओं का रहस्य ? 

33 करोड़ देवी देवता है या नहीं यह जानने से अधिक महत्वपूर्ण है यह जानना की क्या मैं भगवान को मानता हूं?

सच तो यह है की मेरे पास इसका सटीक उत्तर नहीं है।

और इसका उत्तर केवल वही दे सकता है जो इन 33 करोड़ को समझता हो जो इसके पर हो मेरे निजी दृष्टिकोण से मैं इसका उत्तर देता हूं।

मैं शिव को मानता हूं, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं धार्मिक प्रवृत्ति का हूं बल्कि मैं शिव को भगवान की तरह नहीं सेंटर ऑफ यूनिवर्स की तरह मानता हू जहां से सब शुरू हुआ उसे व्यक्ति वस्तु स्थान या केंद्र को मैंने शिव कहा।

हिंदू माइथॉलजी में 33 कोटि देवताओं की बात बहुत प्रसिद्ध है। सामान्य रूप से इसे 33 करोड़ देवी देवताओं का रूप समझ लिया जाता है लेकिन आध्यात्मिक व्याख्या में कोटि का अर्थ प्रकार यह श्रेणी माना गया है।


अगर हिंदू माइथोलॉजी के अनुसार समझे 33-25 = 8 वासु

पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश जैसे महापंच महाभूत हमारे शरीर की मूल संरचना है इसके साथ सूर्य चंद्र और व्यापक ब्रह्मांड या सत्ता को जोड़कर 8 वसुऔ का जिक्र मिलता है।


सोचिए -

हमारा शरीर पृथ्वी से बना है, हमारे भीतर जल है, शरीर में अग्नि है, हम स्वास के माध्यम से वायु से जुड़े हैं, और हमारे अस्तित्व का विस्तार आकाश तक है।

सूर्य हमें ऊर्जा देता है, चंद्रमा हमारे मन तथा प्रकृति के चक्र से जुड़ा हुआ है।


अर्थात मनुष्य जिस शरीर को मैं समझता है वह वास्तव में प्रकृति की अनेक शक्तियों का संगम है।

मतलब मैं केवल शरीर तो नहीं हूं।

अर्थात 8 वसु कहीं बाहर नहीं वसु हमारे भीतर है।


25-13 = 12 आदित्य (हिंदू माइथॉलजी में इसका विश्लेषण मिलता है)


12 आदित्य 12 महीना और सूर्य के समय चक्र से जोड़ता है।

समय लगातार चलता रहता है।

आज जो बच्चा है कल युवा होगा जो युवा है वह प्रेरित होगा और जो जन्म है उसकी आयु प्रत्येक क्षण काम हो रही है।

मनुष्य दुनिया की लगभग हर चीज को रोकना चाहता है यौवन को रोकना चाहता है, धन को रोकना चाहता है, संबंधों को रोकना चाहता है, सुख को रोकना चाहता है, लेकिन समय किसी के लिए नहीं रुकता।

सूर्य प्रतिदिन उगता है और अस्त होता है एक दिन समाप्त होता है फिर दूसरा दिन आता है और इसी तरह मनुष्य की पूरी जिंदगी धीरे-धीरे समय के भीतर समाप्त हो जाती है (अर्थात जिसे हम अपना जीवन समझ रहे हैं वह समय की धारा में लगातार बह रहा है)

जो व्यक्ति समय को रोकने का प्रयास न करें बल्कि समय के प्रति अपने मोह को छोड़ दे, वह व्यक्ति अनुभव कर सकता है इस बदलते शरीर और बदलती परिस्थितियों का और चेतना साक्षी बनती है इस परिवर्तन का।


शायद इसलिए शिव को महाकाल कहा गया जो कि कल अर्थात समय से परे हो।


13-11= 2 अश्विनी कुमार

प्राण अपान

हमारा शरीर केवल हड्डियों मांस और रक्त से बना हुआ यंत्र नहीं है हमारी चेतना और जीवन की अनुभूति स्वास से भी गहराई से जुड़ी है, हम सांस लेते हैं, हम सांस छोड़ते हैं, हर क्षण यह प्रक्रिया चल रही है।

प्राण को जीवन दाहिनी ऊर्जा और अपन को शरीर के नीचे की ओर जाने वाली ऊर्जा के रूप में योग परंपराओं में समझाया गया है।

जब मनुष्य बेचैन होता है उसकी सांस भी अस्थिर हो जाती है जब मन शांत होता है सांस भी स्वाभाविक रूप से शांत होने लगती है, इसलिए शायद योगो ने ध्यान में स्वास्थ्य को साधना का द्वारा माना है।

किंतु इसे समझना अनिवार्य है प्राणायाम केवल सांस रोकने या सांस की तकनीक का नाम नहीं है।

जब स्वास पर ध्यान जाता है तो धीरे-धीरे ध्यान बाहर की दुनिया से हटकर भीतर आने लगता है, और यहां से कुछ नए उद्दीपकों का उद्भव होता है।


11 रुद्र।

11 रुद्रो को इस प्रकार समझते हैं

5 ज्ञानेंद्रिय+ 5 कर्मेंद्रियां + मन।

कान बाहर की आवाज सुनते हैं, नाक गंध को पकड़ी है, जीव स्वाद खोजती है, त्वचा स्पर्श का अनुभव करती है।

फिर कर्मेंद्रिय संसार में सक्रिय होती है हाथ काम करते हैं, पैर चलते हैं, वाणी बोलनी है, और शरीर अपनी विभिन्न क्रियो के माध्यम से संसार से जुड़ा रहता है और इन सब के बीच बैठा है मन।

यही मन इन सभी इंद्रियों को दिशा देता है।

इसी इंद्रियों के स्वामी को शास्त्रों में समझने के लिए देवराज इंद्र कहा गया।

इंद्रिय स्वयं समस्या नहीं है समस्या तब शुरू होती है जब मन इंद्रियों का दास बन जाता है।


आंखों ने कुछ देखा और मन उसके पीछे भाग गया।

कान में कुछ सुना और मन अशांत हो गया।

किसी ने प्रशंसा की मन प्रसन्न हो गया।

किसी ने अपमान किया मन क्रोधित हो गया।

किसी वस्तु को देखकर इच्छा उत्पन्न हुई, किसी व्यक्ति को देखकर मोह उत्पन्न हुआ, और इसी प्रकार मनुष्य बाहरी संसार की अनगिनत इच्छाओं से बंधा रहता है।


यही बंधन रूदन का कारण बनता है।

यदि मन इन सभी इंद्रियों पर नियंत्रण कर ले, तो किसी प्रश्न का उत्तर ढूंढना संभव नहीं रह जाएगा।

मन।


वास्तविकता में मन ही संसार बनता है, मन ही बंधन बनता है, और मन ही मुक्ति का द्वार भी बन सकता है।


मन को छोड़ना सबसे कठिन चरण है।

मन अपनी पहचान नहीं छोड़ना चाहता।

वह कहता है, मैं यह हूं, यह मेरा है, यह मुझे चाहिए, इसने मुझे दुख दिया, इसने मेरा अपमान किया, मुझे यह प्राप्त करना है, मुझे यह खोना नहीं है, और इसी में और मेरा के बीच मनुष्य जीवन भर उलझा रहता है।

क्योंकि मन को लगता है यह शरीर मेरा है यह अपनी सांस मेरी है मैं अपनी इच्छाओं को पूरा कर सकता हूं मैं अपने विचारों को सकारात्मक कर सकता हूं किंतु यदि यह मन नहीं है तो इन सबको देखने वाला कौन है, यही प्रश्न 33 कोटि के पार ले जाता है।

यदि मैं कहूं मैं शिव को पा लिया इसका अर्थ यह नहीं कि मैं किसी बाहरी वस्तु को प्राप्त किया है, मैं शिव को कोई ऐसी वस्तु नहीं मानता जिसे संसार की किसी व्यक्ति वस्तु या स्थान से प्राप्त किया जा सके।

मैं शिव को कोई ऐसी उपलब्धि नहीं मानता जिसे केवल बाहरी कर्मकांड से प्राप्त किया जाए।


शिव का अर्थ उस चेतन की ओर संकेत करता है जो परिवर्तन के बीच अपरिवर्तित साक्षी के रूप में देखी जाती है।


यदि इसे धार्मिक दृष्टिकोण से समझे तो शिव को पाने के लिए इन 33 कोटी देवताओं के पार जाना होगा तभी महादेव मिलेंगे।


इस वाक्य को बाहरी देवताओं के विरोध के रूप में नहीं समझना चाहिए बल्कि इसका अर्थ अधिक गहरा है जब मनुष्य प्रकृति की प्रत्येक वस्तु समय शरीर इंद्रियों और इच्छाओं में ही अंतिम सत्य खोजेगा तब तक उसकी यात्रा बाहरी स्तर पर ही निहित रहेगी।


लेकिन जब वह इन सभी अनुभवों को पार करके उस चेतन को खोजने लगता है जो इन सब की साक्षी है।

यहां मैं देवताओं को संसार की शक्तियों का प्रतीक मानता हूं और शिव को उस परम चेतना के प्रतीक के रूप में, जो सभी सीमाओं से परे है।

जब व्यक्ति 33 कोटी की यात्रा को पार कर जाता है, तब मन का शोर शांत हो जाता है और मन के भीतर की निषब्धता सुनाई देती है।

इसलिए मैंने प्रारंभ में कहा "मैं कौन हूं ?" इसका सटीक उत्तर वही दे सकता है जो उस निषब्धता की स्थिति पर हो।

अनिवार्य नहीं कि मनुष्य संसार का परित्याग करके ही इसके परे जा सकता है। बल्कि यह है कि वह संसार के बीच रहते हुए भी उससे भीतर से बंधा ना रहे।


मनुष्य शरीर का उपयोग करें लेकिन शरीर को अपना अंतिम स्वरूप ना माने।

वह समय में जिए लेकिन समय से भयभीत न हो।

वह इंद्रियों का उपयोग करें लेकिन उसका दास ना बने।

वह मन का उपयोग करें लेकिन मन को अपना स्वामी ना बनने दे।


अंतत अपने भीतर कि उस चेतन को पहचानने का प्रयास करें जिसे मैं शिव कहा।

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